हिंदी कविता – ओ इंसान
ओ इंसान, ज़रा ठहर के सोच,
कहाँ जा रहा है इतनी जल्दी में?
दौड़ता है दिन-रात इस दुनिया में,
क्या पाया तूने इस हलचल में?
धन के पीछे भाग रहा है,
नाम की चाह में जलता है।
पर सच्चा सुख तो वहीं मिलेगा,
जहाँ दिल सुकून से पलता है।
ओ इंसान, क्यों भूल गया तू
धरती की वह सादी राह?
जहाँ प्रेम था हर रिश्ते में,
और मन में बसती थी चाह।
आज नफरत के बीज बोता है,
लालच की आग जलाता है।
फिर सोचता है क्यों दुनिया में
हर दिल दर्द से भर जाता है।
ओ इंसान, याद कर वो दिन,
जब हँसी तेरी सच्ची थी।
छोटी-सी खुशियों में ही
तेरी दुनिया अच्छी थी।
न धन का बोझ था कंधों पर,
न सपनों का भारी जाल।
बस खुला आकाश था ऊपर,
और जीवन था खुशहाल।
समय की धारा बहती जाती,
जीवन का दीपक जलता है।
जो प्रेम बाँटता है जग में,
वही सच्चा इंसान बनता है।
ओ इंसान, जाग अब भी समय है,
दिल में कर ले उजियारा।
नफरत की राह छोड़ दे,
प्रेम ही जीवन का सहारा।
जब दया तेरे मन में होगी,
तब दुनिया भी मुस्काएगी।
तेरे छोटे-से अच्छे कर्म से
नई सुबह फिर आएगी।
ओ इंसान, तू मिट्टी से बना है,
और मिट्टी में ही मिल जाएगा।
पर तेरे कर्मों की खुशबू
दुनिया में सदा रह जाएगा।
इसलिए जीवन को समझ,
हर पल को प्यार से जी।
क्योंकि सच्ची जीत उसी की है,
जो इंसान बनकर जी। 🌼