नीलव को बचपन से ही लगता था कि उसके साथ कुछ अलग है।
ऐसा नहीं कि वह उड़ सकता था या चीज़ें गायब कर देता था—नहीं।
अलग इस मायने में कि दुनिया उसे वैसी नहीं दिखती थी जैसी दूसरों को।
कभी-कभी दीवारें बहुत देर तक उसे देखती हुई लगतीं।
कभी किताबों के पन्ने अपने आप पलट जाते, जैसे किसी को जल्दी हो।
और रात को, सपनों में, वह नीला दरवाज़ा…
हमेशा वही नीला दरवाज़ा।
दरवाज़ा जिस पर कुछ लिखा होता था,
लेकिन वह हर बार पढ़ने से पहले ही नींद टूट जाती।
नीलव ने यह सब कभी किसी को नहीं बताया।
क्योंकि उसने कोशिश की थी—
और लोग हँसते थे।
बारह साल की उम्र में
हँसी सबसे ज़्यादा डराती है।
वह पत्र
उस दिन भी सब कुछ सामान्य था।
स्कूल, होमवर्क, खामोशी।
शाम को जब नीलव खिड़की के पास बैठा था,
तभी उसने परों की आवाज़ सुनी।
एक काला पक्षी—साधारण नहीं—
उसकी आँखों में अजीब-सी चमक थी,
जैसे चाँदी में आग मिल गई हो।
पक्षी ने खिड़की पर बैठकर
पंजे में पकड़ा हुआ एक लिफ़ाफ़ा छोड़ दिया।
लिफ़ाफ़ा गर्म था।
ज़िंदा-सा।
नीलव के हाथ काँप रहे थे
जब उसने उसे खोला।
प्रिय नीलव,
अगर यह पत्र तुम्हारे हाथों तक पहुँचा है,
तो इसका मतलब है—
तुम वही हो।आज सूर्यास्त के बाद
पुराने बरगद के पेड़ के नीचे आना।— अर्केन अकादमी
नीलव को नहीं पता था
कि अकादमी क्या होती है।
पर उसका दिल
पहले ही मान चुका था।
दूसरी दुनिया
बरगद के नीचे पहुँचते ही
सब कुछ बदल गया।
ज़मीन जैसे सांस लेने लगी।
हवा मुड़ गई।
और फिर—
नीलव नीचे गिरने लगा।
डर था,
लेकिन अजीब बात यह थी
कि उसे चोट नहीं लगी।
जब वह रुका,
तो सामने एक ऐसी जगह थी
जो किताबों में भी नहीं होती।
नीले पत्थरों का विशाल महल,
हवा में तैरती सीढ़ियाँ,
और बच्चे—
जो किताबें नहीं,
जादू पढ़ रहे थे।
यह थी अर्केन अकादमी।
यहाँ हर छात्र के अंदर
एक “स्रोत” होता था—
जादू की जड़।
किसी का स्रोत आग था,
किसी का समय,
किसी का प्रकाश।
जब नीलव की बारी आई,
कमरा ठंडा हो गया।
उसके चारों ओर
नीली छाया फैल गई।
शिक्षकों की आँखों में डर था।
उसका स्रोत था—
भय।
अकेलापन
डर से निकली शक्ति
अकादमी में दुर्लभ थी।
और खतरनाक।
कुछ बच्चे उससे दूर रहने लगे।
कुछ फुसफुसाने लगे।
“यह ठीक नहीं है।”
“इससे परेशानी आएगी।”
नीलव चुप रहा।
उसके पास सिर्फ़ दो लोग थे—
इरा,
जो दर्पणों में भविष्य की झलक देख लेती थी,
और कविन,
जो आवाज़ों को आकार दे सकता था।
वे तीनों जानते थे—
अकादमी में कुछ छुपाया जा रहा है।
सातवाँ द्वार
अकादमी में छह द्वार थे।
हर द्वार एक ज्ञान से जुड़ा।
लेकिन एक और था—
जिसका ज़िक्र सिर्फ़ फटी किताबों में मिलता था।
सातवाँ द्वार।
कहा जाता था,
वह डर से जुड़ा है।
और नीलव के सपनों का नीला दरवाज़ा—
वही था।
अंधेरा लौटता है
एक रात
घंटियाँ नहीं बजीं—
चीखी।
आसमान काला पड़ गया।
जादू कमज़ोर होने लगा।
एक नाम फुसफुसाया जाने लगा—
निःशेष।
डर से जन्मी सत्ता।
जो सातवें द्वार को खोलना चाहती थी।
और उसे नीलव चाहिए था।
निर्णय
प्रधान आचार्य ने कहा,
“नीलव को अकादमी छोड़नी होगी।”
नीलव को गुस्सा नहीं आया।
बस दुख हुआ।
लेकिन उसी पल
उसने अपने डर को समझा।
और पहली बार—
उसे नाम दिया।
“मैं नहीं भागूँगा,”
नीलव ने कहा।
“अगर यही मेरी कहानी है,
तो मैं इसे पूरा करूँगा।”
द्वार के सामने
द्वार ने पूछा,
“तुम किससे डरते हो?”
नीलव बोला,
“अकेले रह जाने से।”
“और सबसे ज़्यादा?”
“इससे कि मेरी वजह से
कोई और टूट जाए।”
द्वार खुल गया।
अंत
निःशेष आया।
भयानक,
लेकिन परिचित।
“तुम मेरे जैसे हो,”
उसने कहा।
नीलव मुस्कुराया।
“नहीं।
मैं डर को मानता हूँ,
तुम उससे भागते हो।”
नीली रोशनी फैली।
निःशेष बँध गया।
नष्ट नहीं हुआ।
क्योंकि डर को
खत्म नहीं किया जाता—
समझा जाता है।
नई शुरुआत
नीलव को निष्कासित नहीं किया गया।
उसे बनाया गया—
सातवें द्वार का संरक्षक।
एक ऐसा लड़का
जो जानता था—
सबसे बड़ा जादू
किसी मंत्र में नहीं,
बल्कि खुद को स्वीकार करने में है।
और आज भी,
जब नीला दरवाज़ा
सपनों में आता है,
नीलव डरता नहीं।
वह मुस्कुराता है।