Devkunda Case

Devkunda Case

भारत के पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के एक छोटे लेकिन खूबसूरत कस्बे “देवकुंड” में शामें हमेशा शांत लगती थीं—पर यह शांति बस बाहर से दिखती थी। देवकुंड के घने जंगल, ऊँची पहाड़ियाँ और गहरी घाटियाँ कई अनकही कहानियों को अपने भीतर छिपाए हुए थीं। यही वह जगह थी जहाँ एक ऐसी घटना होने वाली थी जो शहर की आत्मा को हिला कर रख देगी।

Devkunda Case
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यह कहानी है आरव राय की—दिल्ली का एक तेज, ईमानदार और निडर क्राइम-इंस्पेक्टर। लम्बा कद, तीखी आँखें, तेज दिमाग और अपराधियों को छठी इंद्रिय की तरह पकड़ लेने की क्षमता। दिल्ली में एक बड़े गैंगस्टर के केस में अचानक दबाव बढ़ने पर विभाग ने उसे छुट्टी पर भेज दिया था, ताकि वह कुछ दिन आराम कर सके। लेकिन क्या आरव जैसा आदमी कभी आराम करता है? उसका दिमाग हर वक्त केसों पर चलता रहता था। इसी बीच उसके सीनियर ने कहा—“देवकुंड जा कर आओ, ताज़ी हवा खाओ, पहाड़ देखो, लोग अच्छे हैं वहाँ।” आरव हँस दिया था। लोग अच्छे हों या बुरे, अपराध तो कहीं भी हो सकता है—यह बात उसके दिमाग से कभी नहीं निकलती थी।

देवकुंड में उसका स्वागत करने वाली थी सिया ठाकुर—एक स्थानीय पर्वत-गाइड, एडवेंचर इंस्ट्रक्टर और अपने शहर से बेइंतहा प्यार करने वाली निडर लड़की। उसकी आँखों में चमक थी, और उसके कदमों में वो भरोसा जो सिर्फ पहाड़ों पर पलने वालों में होता है। उसे नहीं पता था कि अगले कुछ दिनों में उसकी जिंदगी कैसे उलझने वाली थी। आरव शहर पहुँचा, और तभी से उसके दिमाग में एक अजीब-सी बेचैनी थी। जैसे हवा में कुछ गलत होने की गंध हो। होटल में चेक-इन करते हुए उसने रिसेप्शनिस्ट से पूछा—“यहाँ कुछ अजीब हुआ है पिछले दिनों?” रिसेप्शनिस्ट अचानक चुप हो गया। “न… नहीं सर।” लेकिन उसकी आवाज से साफ था कि वह झूठ बोल रहा था। रात को आरव टैरेस पर गया। ऊपर आसमान शांत था, पर नीचे घाटी की ओर से धुएँ की एक हल्की धारा उठ रही थी। जंगल में आग? नहीं। धुएँ की गंध अलग थी—जैसे कोई रासायनिक चीज़ जल रही हो। वह नीचे उतरकर सड़क पर आया और उसी दिशा में बढ़ने लगा। रास्ता सुनसान था। कुछ दूर जाने पर उसने देखा कि जंगल के बीच एक टूटी-फूटी लकड़ी की झोपड़ी जल रही थी। वह पास गया तो कोई आदमी भागता हुआ दिखा।

“रुको!” आरव चिल्लाया। पर वह आदमी पहाड़ के ढलान में गायब हो गया। जलती झोपड़ी के अंदर आरव को कुछ अजीब बोरे मिले। उसने एक बोरा खोला—अंदर हथियार… और कुछ ऐसे केमिकल जिनका इस्तेमाल बम बनाने में होता है। देवकुंड में हथियारों का जखीरा? क्यों? और किसका? तभी उसके पीछे किसी ने कदमों की आवाज सुनी। वह मुड़ा—सिया खड़ी थी। “आप? इतनी रात को यहाँ?” सिया ने पूछा। “मुझे भी धुआँ दिखा था… इसलिए देखने आ गई।” उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि जिज्ञासा थी। “ये झोपड़ी क्या है?” आरव ने पूछा। “लोग कहते हैं यहाँ कभी कोई रहता था, पर महीनों से खाली है। कई लोग इसे भूतिया भी कहते हैं।” “भूतिया?” आरव मुस्कराया। “अपराध ज्यादा भूतों से जुड़े होते हैं।”

तभी अचानक धुएँ में कुछ धमाका हुआ। दोनों पीछे हटे। झोपड़ी अंदर से उड़ने लगी—उसके बचे हुए हिस्से भी आग पकड़ चुके थे। यह साफ था कि कोई सबूत मिटा रहा था। अगले दिन आरव पूरे जंगल और झोपड़ी के बारे में स्थानीय पुलिस से बात करना चाहता था। लेकिन स्टेशन पर एसएचओ ने अजीब बात कही—“झोपड़ी? वहाँ कोई झोपड़ी नहीं है, जंगल साफ है।” “मैंने अपनी आँखों से देखा है,” आरव जोर से बोला। “सर, आप नई जगह हैं, हो सकता है आपको गलतफ़हमी…” एसएचओ की बात पूरी भी न हुई थी कि आरव ने टेबल पर झोंक दी तस्वीरें जो उसने रात में खींची थीं। एसएचओ का चेहरा उतर गया। “ये केस मत खोलिए सर। यह जगह जितनी शांत दिखती है उतनी है नहीं। यहाँ कुछ लोग हैं जिनसे दुश्मनी ठीक नहीं।” “कौन लोग?” “नाम मत पूछिए। बस कह रहा हूँ… संभल कर रहिए।” पुलिस का डरना आरव के लिए एक संकेत था—यहाँ अपराध गहरा है, और अपराधी शक्तिशाली।

उसी शाम आरव बाजार में घूम रहा था, तभी उसे एक पुरानी फोटो बेचने वाली दुकान दिखी। वह अंदर गया, तस्वीरें देख रहा था और तभी एक फोटो पर उसकी नजर अटक गई। एक पहाड़ी झरना… और उसी झरने के पास खड़े कुछ लोग—उनके चेहरों पर स्कार्फ, और हाथों में वही हथियार जो उसने झोपड़ी में पाए थे। फोटो का कैप्शन था: “5 साल पहले मिला रहस्यमय गिरोह।” दुकानदार बोला—“ये लोग कभी पकड़े नहीं गए। कहते हैं ये सब अब मर चुके हैं… या देवकुंड छोड़ गए।” “नहीं,” आरव ने फोटो की तरफ देखा, “ये लोग वापस आ चुके हैं।” तभी दुकान की खिड़की पर एक पत्थर फेंका गया। काँच टूट गया। बाहर एक बाइक तेजी से भागी। दुकानदार काँप गया—“सर, ये लोगों की फोटो मत देखिए… परेशानी हो जाएगी।” आरव फोटो लेकर बाहर निकला, तभी उसे सिया दिखी। “आप परेशान लग रहे हो,” सिया ने कहा। “तुम्हारे शहर में एक गैंग वापस आया है। और मुझे लगता है वे किसी बड़ी घटना की तैयारी कर रहे हैं।” सिया चुप हो गई। कुछ देर बाद वह बोली—“आपको एक जगह दिखाना चाहती हूँ।” सिया आरव को जंगल की गहराई में ले गई।

एक लंबी पैदल यात्रा के बाद वे एक पुरानी, जर्जर कोठी के सामने खड़े थे। कोठी लगभग खंडहरों जैसी थी। सिया ने कहा—“लोग कहते हैं यह कोठी कभी एक बेहद खतरनाक आदमी की थी—नाम था विराज सिंह। वह पहले सेना में था, फिर गलत रास्ते पर चला गया। हथियारों और केमिकल्स का बड़ा खेल करता था।” “वह मिला नहीं?” आरव ने पूछा। “नहीं। कहा जाता है वह 5 साल पहले मर गया।” “या शायद… सबको ऐसा लगा दिया गया।” आरव की नजरें कोठी की टूटी खिड़कियों में कुछ ढूँढने लगीं। तभी अंदर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज आई। दोनों धीरे से अंदर गए। कोठी धूल भरी थी, पर उसके बीच में एक छोटी टेबल साफ थी—जैसे अभी-अभी साफ की गई हो। उस पर एक नक्शा था—देवकुंड का नक्शा। और नक्शे में तीन जगहों पर लाल गोले बने थे—बाजार, पुलिस स्टेशन और बाँध। “ये बाँध…” सिया ने कहा, “पूरा शहर इसी पानी पर निर्भर है।” “मतलब… ये लोग शहर को ब्लैकमेल कर सकते हैं। या उड़ाने की कोशिश में हैं।”

तभी कोठी की बत्ती झपकी और बंद हो गई—हालाँकि कोठी में बिजली नहीं थी। दरवाजा अपने आप बंद हुआ। आरव तुरंत सिया को नीचे झुकाता हुआ बोला—“किसी ने हमें यहाँ फँसा दिया है। शांत रहो।” बाहर कदमों की आवाज थी। दो लोग अंदर आए। स्कार्फ से ढँके चेहरे, हाथों में हथियार। “भागो!” आरव चिल्लाया। उसने सिया को खिड़की की ओर धक्का दिया। दोनों ने दूसरी मंज़िल से छलांग लगाई और जंगल में दौड़ पड़े। पीछे से गोलियाँ चलाई गईं, पर दोनों भागते हुए झाड़ियों के बीच गायब हो गए। काफी देर बाद एक सुरक्षित खाई में छिपकर दोनों साँस लेने लगे। सिया काँप रही थी। “ये लोग… ये लोग कौन हैं?” “वही गिरोह जिनका जिक्र फोटो में था। विराज सिंह शायद जिंदा है… या किसी और नाम से काम कर रहा है।” अगले दिन आरव ने दिल्ली में अपने वरिष्ठ अधिकारी को कॉल किया। “सर, देवकुंड में बड़ा नेटवर्क है। मुझे बैकअप चाहिए।” “बैकअप? आरव… यह राजनीतिक मामला बन चुका है। ऊपर से आदेश है—कोई कार्रवाई नहीं।” “लेकिन सर—” “तुम्हें देवकुंड में छुट्टी बितानी थी। कृपया कोई दखल मत दो।” फोन कट गया। आरव समझ गया—यह मामला बहुत गहरा है। शायद सरकार के भी कुछ लोग इस गैंग से जुड़े हों। अब वह अकेला था… अकेला लेकिन सिया उसके साथ थी। उसी रात वे बाँध की ओर गए। बाँध के पास कुछ गाड़ियाँ खड़ी थीं। चार आदमी बड़े बॉक्स उतार रहे थे—बॉक्स जिनमें वही हथियार और केमिकल थे। तभी वहाँ सबसे आगे एक आदमी निकला। लम्बा, रौबदार, तेज नज़र… वही चेहरा जो कोठी में लगी फोटो में था। यह था—विराज सिंह। जिंदा। और पहले से ज्यादा खतरनाक। “तो… यह है हमारा मेहमान,” विराज ने कहा, जैसे उसे पहले से पता था कि आरव पास ही छिपा है। “इंस्पेक्टर आरव राय,” वह जोर से बोला, “अगर तुम यहाँ हो तो बाहर आ जाओ।” “भागो!” सिया ने फुसफुसाया। पर आरव उठकर सामने आया। “ये खेल अब खत्म होगा, विराज!” विराज हँसा। “तुम अकेले हो। तुम्हारे दिल्ली वाले भी तुम्हारे खिलाफ हैं। पुलिस मेरे हाथ में है। और शहर का बाँध… बम लग चुका है। अगर तुमने दखल दिया तो यह शहर पानी में समा जाएगा।” यह सुनते ही सिया डर से पीछे हट गई। “तुम पागल हो गए हो!” “नहीं,” विराज बोला, “मैं सत्ता में वापस आ रहा हूँ। और जिसने भी मुझे रोका… मिटा दिया।” विराज ने सिया को पकड़ने का इशारा किया। उसके आदमी उसकी तरफ बढ़े।

आरव ने तुरंत हमला किया। एक आदमी को गिराया, दूसरे का हथियार छीना। गोलियाँ चलीं। जंगल में अफरातफरी मच गई। आरव ने सिया का हाथ पकड़ा और बाँध के भीतर बने टनल की ओर दौड़ा। दोनों अंदर घुसे—विराज के आदमी पीछे थे। टनल अंधेरी थी। पानी की आवाज गूँज रही थी। बीच में आरव को एक छोटा कंट्रोल बॉक्स दिखा—उसमें टाइमर चल रहा था। बम! “5 मिनट…” आरव बोला। “इसे रोकना होगा!” सिया बोली। “तुम्हें बाहर जाना होगा।” “नहीं! मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगी!” “सिया, सुनो। अगर बम फटा तो शहर खत्म। तुम जाओ और पुलिस को बुलाओ… मैं इसे रोकने की कोशिश करता हूँ।” “पर—” “जाओ!!!” आँसू भरी आँखों से सिया दौड़ पड़ी। आरव ने बॉक्स खोलकर तारों को देखा—जटिल, खतरनाक, किसी प्रोफेशनल द्वारा सेट किया गया। तभी पीछे से आवाज आई—“मैंने कहा था ना… यह शहर मेरा है।” विराज टनल में उतरा। हाथ में बंदूक। “तुम्हारे जैसे लोग मुझे रोक नहीं सकते।” “देखेंगे,” आरव बोला।

विराज ने गोली चलाई—पर आरव तेजी से पीछे हट गया। दोनों के बीच जोरदार लड़ाई हुई। टनल में पानी की बौछारें उड़ रही थीं। मुक्के, ठोकरें, बंदूकें गिरती-पकड़ती, दोनों ज़ख्मी हो गए। आखिरकार आरव ने विराज को बाँध की लोहे की रेलिंग से दे मारा। विराज गिरा… और उसके हाथ से बंदूक दूर जा गिरी। टाइमर पर सिर्फ 40 सेकंड बचे थे। आरव ने वापस तारों की ओर देखा—लाल तार, नीला तार, पीला… कौन सा काटे? तभी उसे सिया की आवाज याद आई—“तुम यह कर सकते हो।” उसने गहरी साँस ली… और नीला तार काट दिया। टाइमर रुक गया। बम निष्क्रिय। वह जमीन पर बैठ गया—थका, पर विजयी। ऊपर से सायरन की आवाज आई—पुलिस, मीडिया, लोग।

सिया दौड़कर अंदर आई और उसे गले लगा लिया। “तुमने कर दिखाया!” “हमने,” आरव ने कहा। विराज को गिरफ्तार कर लिया गया। उसका गिरोह भी पकड़ा गया। देवकुंड बच गया। अगले दिन जब पूरा शहर आरव को हीरो मान रहा था, सिया उसके पास आई। “अब तो वापस दिल्ली जाओगे, है ना?” आरव मुस्कुराया—“शायद। पर… कुछ जगहें इंसान को बुलाती हैं। और कुछ लोग… रोक लेते हैं।” सिया शरमा गई। हवा में शांति थी—इस बार सच्ची शांति। और इस तरह देवकुंड की घाटियों में जन्म हुआ एक नए किस्से का—एक निडर इंस्पेक्टर, एक बहादुर लड़की, और अपराध से भरी उस रात की कहानी जिसने दोनों को एक-दूसरे के और करीब ला दिया। दुनिया ने इसे ‘देवकुंड केस’ कहा—पर देवकुंड के लोग इसे उस रात की कहानी कहते हैं… “जब दो दिलों ने मौत से भी बड़ी साजिश को हराया।”

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