जब बारिश ने हमें पहचान लिया

जब बारिश ने हमें पहचान लिया

उस दिन बारिश नहीं हो रही थी,
लेकिन हवा में उसकी गंध थी।

आकाश बादलों से भरा था, जैसे कुछ कहना चाहता हो, पर शब्द ढूँढ रहा हो। रेलवे स्टेशन की भीड़ में लोग जल्दी में थे—कोई नौकरी के लिए, कोई घर लौटने के लिए, कोई किसी से भागने के लिए।

और वहीं, उसी प्लेटफॉर्म पर, अनन्या खड़ी थी—
आकाश की ओर देखकर मुस्कुराती हुई।

आरव ने उसे पहली बार वहीं देखा।

वह मुस्कान साधारण नहीं थी।
वह ऐसी मुस्कान थी जैसे कोई इंसान मौसम से बात कर रहा हो।

आरव को नहीं पता था कि वह क्यों रुका,
क्यों भीड़ के साथ आगे नहीं बढ़ा,
बस इतना जानता था कि उस मुस्कान ने उसे थाम लिया।

पहली बारिश की बूँद गिरी।
अनन्या ने आँखें बंद कीं और धीमे से कहा,
“आ ही गई तुम।”

आरव हँस पड़ा।

“बारिश से बातें करती हो?” उसने पूछा।

अनन्या ने उसकी ओर देखा, ज़रा चौंकी, फिर बोली,
“कोई तो है जो बिना जवाब माँगे सुनती है।”

और उसी पल,
एक अजनबी बातचीत दोस्ती की ओर बढ़ने लगी।


ट्रेन लेट थी।
दोनों के पास समय था—और अनजाने में, एक-दूसरे के लिए जगह भी।

अनन्या ने बताया कि वह चित्रकार है, लेकिन अधूरी पेंटिंग्स से भरा कमरा उसका सबसे बड़ा सच है।
आरव ने कहा कि वह लेखक है, लेकिन उसकी कहानियाँ किसी डायरी से बाहर नहीं निकलतीं।

दोनों हँसे।

“अधूरापन भी एक कला है,” अनन्या ने कहा।

“और डर भी,” आरव ने जोड़ा।

बारिश तेज़ हो गई।
वे दोनों प्लेटफॉर्म की छत के नीचे खड़े थे—पास, लेकिन छुए बिना।

नंबरों का आदान-प्रदान ऐसे हुआ जैसे कोई भविष्य चुपचाप हाथ थाम रहा हो।


उनका प्यार जल्दी में नहीं था।

वह धीरे-धीरे खुला—
कॉफ़ी से शुरू होकर लंबी सैरों तक,
सवालों से होकर खामोशियों तक।

अनन्या बात करते समय हाथों से हवा में आकृतियाँ बनाती थी।
आरव उसे ऐसे सुनता था जैसे हर शब्द ज़रूरी हो।

अनन्या को तूफ़ान पसंद थे।
आरव को शांति।

अनन्या को अधूरे सपनों से डर नहीं लगता था।
आरव को पूरे सपनों से।

फिर भी,
वे एक-दूसरे के साथ सुरक्षित महसूस करते थे।

कभी-कभी वे बिना बोले घंटों बैठे रहते।
उस चुप्पी में कोई दबाव नहीं था।

आरव ने तब समझा—
प्यार हमेशा शोर नहीं करता।
कभी-कभी वह बस मौजूद रहता है।


आरव को एहसास तब हुआ कि वह अनन्या से प्यार करता है,
जब वह एक फिल्म देखते-देखते उसके कंधे पर सो गई।

फ़िल्म खत्म हो गई,
क्रेडिट्स चलने लगे,
पर आरव हिला नहीं।

उसे डर था—
अगर वह हिला,
तो यह पल टूट जाएगा।

उसने सोचा,
अगर ज़िंदगी मुझे बस यही पल दे,
तो भी यह काफ़ी होगा।

और उसी विचार ने उसे डरा दिया।


अनन्या को प्यार का एहसास एक अलग दिन हुआ।

उसकी प्रदर्शनी रद्द हो गई थी।
महीनों की मेहनत—बस एक ईमेल में ख़त्म।

उसने बिना सोचे आरव को फ़ोन किया।

आरव ने सवाल नहीं पूछे।
सलाह नहीं दी।
बस कहा,
“मैं आ रहा हूँ।”

वह भीगता हुआ आया,
और बस सुनता रहा।

जब अनन्या थक कर चुप हो गई,
आरव ने कहा,
“तुम्हारा काम मायने रखता है।
भले आज कोई न देखे।”

उसी पल अनन्या जान गई—
प्यार वही है जो टूटे विश्वास को थाम ले।


लेकिन हर प्यार को एक इम्तिहान मिलता है।

आरव को दूसरे शहर में नौकरी मिल गई।
एक बड़ा मौका।
एक बड़ा फ़ैसला।

उसने अनन्या को बताया।

अनन्या ने रोना नहीं चुना।
उसने मुस्कुराया।
कहा, “मुझे तुम पर गर्व है।”

पर उस मुस्कान में डर छुपा था।

दूरी धीरे-धीरे भारी होने लगी।

कॉल्स कम हुए।
मैसेज छोटे।

अनन्या की पेंटिंग्स फीकी पड़ने लगीं।
आरव की कहानियों में खालीपन बढ़ गया।


झगड़ा अचानक हुआ।

बात छोटी थी,
लेकिन चोट पुरानी।

शब्द तेज़ हो गए।
चुप्पी हथियार बन गई।

अनन्या ने कहा,
“तुमने सपनों को चुना, मुझे नहीं।”

आरव बोला,
“तुम नहीं समझती यह मेरे लिए क्या है।”

कॉल कट गई।

और साथ ही,
कुछ और भी।


समय बीता।

अनन्या की एक पेंटिंग बिकी।
आरव को प्रमोशन मिला।

दोनों खुश थे—
अकेले।

एक साल बाद,
उसी स्टेशन पर,
उसी गंध वाली हवा में,
वे फिर मिले।

बारिश फिर आने वाली थी।

“अब भी आसमान से बातें करती हो?” आरव ने पूछा।

अनन्या मुस्कुराई,
“जब वह सुनने लायक हो।”

उन्होंने बात की—
खुलकर।
सच के साथ।

अनन्या बोली,
“मुझे ऐसा प्यार नहीं चाहिए जो सिर्फ उम्मीद पर टिका हो।”

आरव ने कहा,
“और मुझे ऐसी सफलता नहीं चाहिए जिसमें घर न हो।”

बारिश गिरने लगी।


इस बार उनका प्यार अलग था।

कम आदर्शवादी,
ज़्यादा सच्चा।

उन्होंने एक-दूसरे को चुना—
डर के बावजूद।

आज भी,
जब बारिश होती है,
अनन्या मुस्कुराती है,
आरव सुनता है।

और बारिश—
अब उन्हें पहचानती है।

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