एह काश कि अब
वक़्त थोड़ा ठहर जाए,
भागती साँसों को
अपनी ही धड़कन सुनने का
एक बहाना मिल जाए।
एह काश कि अब
हम जवाबों से ज़्यादा
सवालों से दोस्ती करें,
और सही साबित होने से पहले
सच्चा होने की हिम्मत करें।
एह काश कि अब
शब्द हथियार न बनें,
ख़ामोशी बोझ न लगे,
और जो कहा न जा सके
वह भी समझ लिया जाए।
एह काश कि अब
हम लौट सकें
उन अधूरे पलों में,
जहाँ हँसी बिना वजह थी
और आँसू बिना डर के।
एह काश कि अब
आईने हमसे
सच न छुपाएँ,
और चेहरे पर जमी
थकान को भी
इज़्ज़त मिल जाए।
एह काश कि अब
हम जीत को
सब कुछ न मानें,
और हार से
कुछ सीखने का
हौसला बचा रहे।
एह काश कि अब
रिश्ते आसान हों,
बिना शर्त,
बिना हिसाब,
बिना इस डर के
कि कौन पहले बदलेगा।
एह काश कि अब
दिल की आवाज़
नोटिफ़िकेशन से ऊँची हो,
और नींद
स्क्रीन से ज़्यादा सच्ची।
एह काश कि अब
हम बच्चों की तरह
फिर से पूछ सकें—
क्यों?
बिना यह सोचे
कि लोग क्या कहेंगे।
एह काश कि अब
थोड़ा कम साबित करें,
थोड़ा ज़्यादा महसूस करें,
और ज़िंदगी को
सिर्फ़ जीने के बजाय
समझने की कोशिश करें।
एह काश कि अब
यह “अब”
कभी ख़त्म न हो,
और हम हर दिन
थोड़ा बेहतर इंसान बनकर
सोने जाएँ।